नवजात मेमनों का ध्यान रखना

0

नवजात मेमना निरोगी, सशक्त और तजेदार होनी चाहिए, इसलिए बकरी के, गाभिन काल में विशेष ध्यान रखना पड़ता है। बकरी पालन व्यवसाय की सफलता और समृद्धी नवजात मेमनों के संगोपन पर निर्भर होती है।

मेमने गर्भ में होते समय ध्यान रखना
बकरी उन्माद पर आने के बाद उसे निसर्गत: अथवा कृत्रिम प्रणाली से भरना पड़ता है। इसके बाद महिना भर में वह उन्माद पर नही आई तो वह गाभिन रहने के आसार ज्यादा होते है। बात की पुष्टि हो जाने के बाद उसका गाभिन काल पाच माह का होता है। इस काल का नियोजन अच्छी तरहसे करना चाहिए। आरंभ के दो तीन माह गर्भ की वृद्धि धीरे धीरे होती है, तो भी बकरी को सकस, ताजा, पोषाहार देने की आवश्यकता होती है। आखरी दो माह में गर्भ में ने की बहुत तेजीसे होती है। इसलिए गाभिन बकरी दूध देनेवाली हो तो उसफा दूध कम कर उसने जो भी आहार लिया है, उसमें से पोषक द्रव्ये दूध के निर्माण के लिए काम आते है, इसलिए गर्ममें पलनेवाले मेमने को अच्छी पोषाहार के घटक नहीं मिल पाते| इसलिए उसका दूध लेना कम करना चाहिए। गाभिनकाल में बकरी को आखरी दो-तीन माह में बड़े पैमाने पर हरी घास, और कुछ मात्रामे सुखा घास देना चाहिए। इससे हरी घास से क्षार, कॅशियम और बाकी सारे पोषकद्रव्ये गर्भ में पलनेवाले मेमनों को मिल जाते है। और मेननों की हडियाँ, स्नायू मजबूत होते है| बकरी को प्रसव के समय होनेवाली त्रासदी में शक्ती प्राप्त होती है, और पीड़ा हुने जिए कि मिलती है।

जनम के बाद मेमनों का ध्यान रखना
गाभिन बकरियों को रखनेवाली जगह साफ-सुथरी और सूखी होनी चाहिए। जगह पर के जंतुनाशक जंतुरहित करना करना जरूरी होता है। घास डालनेसे पहले जमीपर चूने की भुकटी डालना जरूरी है। दूसरे नवजात मेमनों के शरीर में रोगजंतू का प्रवेश होकर बीमारी का धोका नही होता। धकरियाँ नैसर्गिक तरीके से मेमानों को जनम देती है। लेकिन जुडवा अथवा उससे ज्यादा मेमने होनेवाले हो और एखाद मेमना आडा हो गया तो और दूसरे किसी भी वजहसे मेमना बाहर आनेमें कठिनाई हो रही, तो पशुचिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। बकरी के प्रसव के बाद मेमने के नथुने के अंदर का पतला पर्दा निकाल देना चाहिए। इससे सांस लेना आसान हो जाता है। प्रसवके बाद बकरी मेमने को चाटती रहती है। यह क्रिया अत्यवश्यक है। मेमना साफ हो जाता है। उसके बाद मोटे कपड़े से मेमन को सुखाना चाहिए। मेमने को सुखाने से उसका सर्दिसे बचाव होता है और उसको न्यूमोनिया होने का डर रहता नही। मेमने की नाभिनाड़ी या नामिरज्जू एक से दो इंच दूरी रखकर काँटनी चाहिए। इस के लिए निर्जंतुक दवाईमें कैची डुबोकर अथवा नये ब्लेडका प्रयोग करना चाहिए। जहाँ नाभिर काँट दी है, वहीं टिंक्चर आयोडिन लगाना जरुरी है। नामिनाडी का सामनेवाला हिस्सा साफ धागेसे कसकर बाँधना चाहिए। मेमना जनमके बाद १५ से २० मिनिटमें धीरे धीरे खड़ा रहता है और बकरी का दूध पीने का प्रयास करता है। लेकिन मेमना कमजोर होने से उसखा रहना अगर मुश्किल होता होगा तो उसे खड़े रहने में मदद कर के बकरी का दूध पिलाना चाहिए।

नवजात मेमनों को फेनूस की आवश्यकता
मेमना जनम लेने के बाद एक घंटे के अंदर बकरी से जो दूध मिलता है उसे फेनस अथवा पेवस कहा जाता है। यह फेनूस मेमने को अति आवश्यक होता है। जनम के बाद पहले तीन-चार दिन पेवस का दूध मेमने को मिलना बहुतही जरूरी होता है। इस फेनूस से मेमने में रोगप्रतिबंधक द्रव्य मिल जाते है। पेवस में बहुत ज्यादा मात्रा में प्रथिने, जीवनसत्वे, खनिज पदार्थ होते हैं, इससे मेमने सशक्त और निरोगी, सुदृढ होने में मदद मिलती है बकरी को एक से ज्यादा मेमने हो गये, तो सभी को पर्याप्त मात्रामें फेनूस मिलना चाहिए, इसकी सावधानी बरतनी पड़ती है। कुछ कुछ बकरियाँ ज्यादा मेमनों को जनम देती है, इसलिए मेमनों को पर्याप्त मात्र में दूध नहीं मिलता, ऐसे समय गाय का दूध मेननों को दिया तो भी चलता है।

मेमन को बकरी से अलग रखना
नजात मेमने चार से पाँच दिनके हो गये तो, उन्हें बकरी से अलग स्वतंत्र, जगपर रखना चाहिए। बकरी की के पास होते, तो मेमने बार बार दूध पीने लगते है, और इसका परिणाम स्वरूप चारा कैसे खाना चाहिए, यह मेमने ठीक से सीख नही पाते। मेमना और का हित ध्यान में रखते हुए, हररोज सुबह और शामको नियमित रुप से एक समयपर मेमने को बकरी के पास दुध पिने के लिए छोड़ना चाहिए। मेमनों का सर्दी से बचाव करने के लिए बाहे में अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।

मेमनों को दूध और खाद देने का नियोजन
नवजात मेमनों का बाड़े में मुक्त विहार करने के लिए छोडा, तो उनको अपने आप नैसर्गिक तौर अच्छा व्यायाम हो जाता है। इसका ध्यान अवश्य रखना चाहिए। मेमनों को लगनेवाला दूध दिन में दो या तीन बार थोडा थोडा कर के देना चाहिए। दूध का समय निश्चित किया तो उसे आम तौर पर बदलना नहीं चाहिए। इससे मेमनों की पाचकशक्ती अच्छी होने में मदद मिलती है। दूध पिलाने के बर्तन, जगह साफ रखना जरती है। अस्वच्छ हो, तो कृमिजंतू मेमने के पेटमें जाने की संभावना अधिक होती है| मेमना दो-तीन सप्ताह का हो जाए तो उसे झाड़ या पाला खाने की आदत धीरे धीरे लगानी चाहिए। सेंमल का पाला मेमनों को बड़ा अच्छा लगता है। सेमलने मेमने चारा खाना तेजीसे सीखते है। छोटा मेमना चारा खाने लगा, तो उसको दुध धीरे धीरे कम करना चाहिए और ढाई से तीन माह के बाद इसका दूध बंद करना चाहिए। मेमनोंका दूध अचानक से पूरा बंद किया और उन्हें चारा दिया तो उनका पचन तंत्र बिगड़ता है। छोटे मेमनी को बारीश के बाद नए कोपलेयाले घास में चरने के लिए छोड़ना नही चाहिए। इस नये हरे घास से मेमनों को अतिसार, दस्त होने की संभावना रहती है। और दस्त पर काबू नहीं पा सके तो मेमने के शरीर में पानी की कमी होती है इस में मेमने की मृत्यू भी हो सकती है।

मेमनों को नियमित रुप से कृमिनाशक दवाई देना
बकरियाँ और मेमनों को कृमि का प्रादुर्भाव साल में बारह महिने होने की संभावना रहती है। मेमनों को कृमि हो जाए, तो उनके विकास और वृदी में बाधा उत्पन्न होती है। पेट में कृमि हो जाने से मेमना या बकरी को कितना भी खिलाओ वह नरम दिखाई देती हैं। उनके बदन के बाल एकदम कड़े और अस्तव्यस्त, एकदम बिखरे हुए हो जाते हैं। उनके विष्ठा की पिण्ड नहीं बनती यह पतली सी रहती है| और उनके जबड़े की निचले हिस्से में सूजन आ जाती है। बकरियों की पलके सफेद हो जाती है। मेमनों का पेट फूल जाता है। जिसे मेमनों को अच्छे दाम नहीं मिलते। मेमने में कृमिका प्रकोप ज्यादा हो जाए, तो उनकी मृत्यू हो सकती है। कृमि का प्रसार मल-मूत्र से एक दूसरे जानवरों को भी होता रहता है। बाद में दवाई के लिए माग दौड़ करनेसे अच्छा है, की उनके प्रतिबंधात्मक उपायों के तहत पहलेही कृमिनाशक दवाई पिलानी चाहिए।

कृमि प्रतिबंध के उपाय
बारीश के मौसम में जमा हुए पानी में कृमि के अंडे-बडे पैमानेपर होते है| ऐसा पानी बकरी, मेमने अथवा बाकी जानवरों को पिलाया जाए, तो कृमिओं का प्रदर्भाव बढ़ सकता है। और तेजी से फैल भी सकता है। इनका प्रतिबंध करने के लिए गोलियां, दवाई, मुरमुरी मुकटी और इंजक्शन भी उपलब्ध हैं। इनके मदद से कृमि नाश संभव होता है। इनका इस्तेमाल कैसे करना है| इसके बारेमें पशु चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए। कृमिनाशक दवाई और प्रतिबंधक उपाय के लिए परे साल की समय सारिणी बनानी अच्छी होती है। मेमना एक दो माह का हो जाने के बाद उसे नियमित रुपसे ढाई से तीन माह में निश्चित अंतराल से कृमिनाशक दवाई देना जरुरी है। दवाई अदल-बदल कर देनी चाहिए। मेमनी के साथ साथ बकरियों को भी तीन से चार माहमें नियमित अंतराल से यह दवाई देनी चाहिए। बकरियाँ और मेमनों को कमसे कम गर्मी और बारीश के बाद और गर्मी से पहले कृमिनाशक दवाई पिलाना बहुत ही आवश्यक है। इसमें कोई भी कोता ही बरतना ठीक नहीं है ।

मेमनों की शारीरिक वृद्धी / विकास
बकरी पालन क्षेत्र में कार्यरत संस्था और पशुसंवर्धन विभाग ने यहाँ का तापमान और बकरियों की जाति का एक विस्तृत सर्वेक्षण किया है। इस सर्वेक्षण के निष्कर्ष के अनुसार मेमनों का भार – वजन हर माह कैसे बढ़ता है, और उनका विकास कैसे हो जाता है इसका अनुपात दिया है –
पहला माह-६५ से ८० ग्रॅम प्रतिदिन
दुसरा माह ६० से ६५ ग्रॅम प्रतिदिन
तिसरा माह ५५ से ६० ग्रॅम प्रतिदिन
पाँचवा माह ४५ से ५० ग्रॅम प्रतिदिन
छठा माह ४० से ४५ ग्रॅम प्रतिदिन
सातवे माह से बारह माहत व नर मेमने का वजन हर महिन में छेद से ढाई किलो और मादा मेमने का वजन कम से दो किलो भार बढता है। मेमने को खाद्यान्न का अच्छा नियोजन किया जाए तो नर और मादा इसी उम्र में उन्माद पर आ जाते है। इस उम्र मादा उन्माद पर आ भी जाए तो यह उप पैदावार के लिए योग्य मानी जाती है। छोटे मेमन को भर दिया जाए तो उनसे होनेराले मेमने नि: शक्त होते है। और मादा जुडवा मेमने देने का अनुपात बहुत कम होता है। इसका मतलब छोटे मेमने भर दिया जाए तो उनसें होनेवाले मेनने निशक्त होते है| और मादा जुड़वा मेंने देने का अनुपात बहुत कसम होता है| इसका मतलब छोटे उम्र ने मेमने भर दिए,तो भविष्य में उनकी प्रजनन क्षमता पर दुष्परिणाम होने की संमावना अधिक होती है| छह माह के बाद नर और मादा मेमने अलग अलग रखने चाहिए।

छोटे मेमनों को बधियाना
पैदवार के लिए नर बकरे का चयन करने के बाद बाकी नर बकरों को छोटी उम्र में बाधियाना चाहिए। यह प्रक्रिया घर में करना जोखिमभरा होता है। पशुचिकित्सक का मार्गदर्शन लेकर ही बकरी को बधियाना चाहिए। मांसोत्पादन के लिए जो बकरे पाले जाते है, उनका विकास और बृदी बधियाने के बाद ही तेजी से होता है। उनके मांस का दर्जा भी अच्छा होता है।

मेमनों की बिक्री
बकरी के मांस को साल में बात माह माँग ली है| तथापि चातुर्मास में मांसाहार ना करनेवाले लोगों की तादाद ज्यादा होती है। इसका मतलब चातुर्मास में कम लोग मांसाहार करते है। इसलिए दर घट्ने की आशा होती है। चातुर्मास के बाद मांसाहारी लोग बदते है और बाजार में जोर-शोर से तेजी आती है। इस समय की माँग ध्यान में रखकर मेमनी की बिक्री करना लाभदायक साबित होता है। इसलिए बकरियाँ एक साथ उन्माद पर आने के लिए आधुनिक पद्धति से नियोजन करना अच्छा रहता हैं। तीन माहतक मेमनों को पालने का खर्च बहुत है। कम होता है। उससे अधिक उम्र के मेमनों की देखभाल का खर्चा ज्यादा होता है। आठसे दस माहके उम्र के मेमनों को मांस के लिए ज्यादा माग होती है। और इनका मांस भी स्वादिष्ट होता है। उसमें १७ प्रतिशत प्रथिने होती है, इसलिए तज्ज्ञ लोग ऐसे मेमनों को विशेष पसंद करते है।

मेमन की कीमत
मेमन की कितनी कीमत मिल जाएगी, इसकी कोई हमी नहीं रहती। इसलिए मेमनों को बाजार में ले जाने से पहले ही दरों की जानकारी लेनी चाहिए। मेमनों संपूर्ण भार से पचास प्रतिशत मांस मिलता है। इसलिए मेंमनो का भार और मांस का दर इनका मेल लगाकर किंमत निश्चित करनी चाहिए। बेपारीओं को मेमनों का मांस चमडी और मुंडी से लाभ होता है।

 

➡️➡️➡️मौसम, फसल, सिंचाई जैसी कृषि सलाह पाने के लिए निम्नलिखित लिंक पे फॉर्म भरें। ये जानकारी आप अपने व्हाट्सएप पर मुफ्त में प्राप्त कर सकते हैं।

 

https://whatsapp.heeraagro.com

 

मंत्र आधुनिक खेती का ! दोस्त आधुनिक किसान का !!

इस सत्र के लिए हम किसानों की सुविधा के लिए, यह जानकारी अन्य किसानों की सुविधा के लिए लेख आप [email protected] ई-मेल आईडी या 8888122799 नंबर पर भेज सकते है, आपके द्वारा सबमिट किया गया लेख / जानकारी आपके नाम और पते के साथ प्रकाशित की जाएगी।

Leave A Reply

Your email address will not be published.