सांवा खेती कि उन्नत तकनिक

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सांवा की फसल भारत की एक प्राचीन फसल है यह रूप पहाड़ो क्षेत्रो में बोई जाने वाली सूखा फसल हैI असिंचित क्षेत्रो में बोई जाने वाली मोटे अनाजों में इसका महत्वपूर्ण स्थान हैI इसमे पानी की आवश्यकता अन्य फसलो की अपेक्षा काम पड़ती हैI सांवा का उपयोग चावल की तरह किया जाता हैI इसका हरा चारा पशुओ को खिलने से उनकी सेहत अची रहती है, और उन्हें बहुत भी पसंद आता हैI इसमे चावल की तुलना में पोषक तत्वों के साथ-साथ प्रोटीन की पाचन योग्यता 40 प्रतिशत तक होती हैI

सांवा की खेती दानों के साथ-साथ अच्छे गुणों के लिये लाभदायक रहते हैI सांवा की खेती मैदान के साथ – साथ पर्वतीय स्थानों पर भी की जाती है। भारतवर्ष में सांवा की खेती उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश ऐसे अलग अलग कुछ क्षेत्रों में की जाती है।

जमीन की तयारी कैसे करे-  

सांवा की फसल कम उपजाऊ वाली मिट्टी में लगाई जाती हैI इसे नदियों के किनारे की निचली भूमि में भी उगाया जा सकता हैI लेकिन इसके लिए बलुई दोमट और दोमट भूमि सर्वाधिक उपयुक्त होती हैI

सांवा की खेती मैदानी एवं पर्वतीय स्थानों पर छोटे-छोटे खेतों में की जाती है। हल्की एवं कम उर्वरता वाली भूमि में खेती हेतु एक से दो गहरी जुताई वर्षापूर्व आवश्यक है।

बीज, जमीन, बीजदर और बोने का समय-

सांवा की बहुत सी प्रचलित प्रजातियां है जैसे की टी.46, आई. पी.149, यु.पी.टी.8, आई.पी.एम.97, आई.पी.एम.100, आई.पी.एम.148, आई.पी.एम.151 यह प्रजातीया पाई जाती है।

ज्यादा उत्पादन लेने के लिये उन्नत किस्मों का चुनाव करें। हल्की व पथरीली भूमि के लिए जल्द पकने वाली तथा मध्यम उर्वरता वाली भूमि हेतु मध्यम समय में पकने वाली बीज को पसंत करें। बीज कतार में बोने के लिये बीज दर 8 से 10 किलो प्रति हेक्टर तथा छिड़काव पद्धति से बोआई के लिये 12 से 15 किलो बीज प्रति हेक्टर हेतु आवश्यक है। तमिलनाडु में असिंचित फसल की बोआई सितम्बर-अक्टूबर माहिने में तथा सिंचित फसल की बोआई फरवरी-मार्च में की जाती है जबकि उत्तराखंड के पर्वतीय स्थानों पर अप्रैल-मई महिना बोआई करने के लिए ठीक रहते है। मध्यप्रदेश के लिये मान्सून शुरू होने के साथ और 10-12 जुलाई के पहले बोआई करने पर सर्वाधिक उत्पादन प्राप्त होता है। बोआई पूर्व फफूंदनाशक दवा कार्वेन्डाजिम या कार्वोक्सिन का 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार आवश्यक है

सिंचाई कैसे करे-

सांवा की खेती में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है क्योंकि, यह खरीफ अर्थात बारिश के मोसम में आने वाली फसल है लेकिन काफी समय तक जब पानी (बारिश) नहीं बरसता है तो फूल आने की अवस्था में एक सिंचाई करना आवश्यक रहता हैI जल भराव की स्थिति वाली जमीन में जल निकास होना आवश्यक हैI

रोग तथा उनका नियंत्रण कैसे करना चाहिए-

सांवा में तुलसित, कंडुवा, रतुआ या गेरुई रोग लगते हैI रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर अलग कर देना चाहिए तथा मैन्कोजेब 75% डब्लू. पी. को 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिएI इसके साथ ही साथ बीज उपचारित ही बोना चाहिएI

इसमे दीमक एवं तना छेदक कीट लगते है नियंत्रण हेतु खेत में कच्चे गोबर का प्रयोग नहीं करना चाहिए, बीज शोधित करके बोना चाहिए, फोरेट 10 % सी.जी. किलो ग्राम प्रति हेक्टर में इसका प्रयोग करेI क्यूनालफास 25 ई.सी. 2 लीटर की दर से प्रति हेक्टर छिड़काव बी कर सकते हैI

कटाई-
सांवा की फसल पकाने पर ही कटाई हसिया द्वारा पौधे सहित करनी चाहिएI इसके छोटे-छोटे बण्डल बनाकर खेत में ही एक सप्ताह तक धूप में अच्छी तरह सुखाकर मड़ाई करनी चाहिएI इसकी पैदावार में दाना 12 से 15 कुंतल प्रति हेक्टेयर तथा भूसा 20 से 25 कुंतल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता हैI

 

 

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