चलो करे अलसी कि खेती

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अलसी तिलहन फसलों में दूसरी महत्वपूर्ण फसल है। विश्व में अलसी के उत्पादन के दृष्टिकोण से हमारे देश का तीसरा स्थान है जबकि प्रथम स्थान पर कनाडा व दूसरे स्थान पर चीन है। वर्तमान समय में लगभग 448.7 हजार हैक्टेयर भूमि पर इसकी खेती की जा रही है एवं कुल उत्पादन 168.7 हजार टन व औसतन पैदावार 378 कि. ग्रा. प्रति हैक्टेयर है। भारत मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ, बिहार, राजस्थान, ओडिशा, महाराष्ट्र एवं कर्नाटक आदि प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है। अलसी के कुल उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत खाद्य तेल के रूप में तथा शेष 80 प्रतिशत तेल औद्योगिक प्रयोग जैसे सूखा तेल, पेन्ट बनाने में, वारनिश, लेमिनेशन, तेल कपड़े, चमडे, छपाई की स्याही, चिपकाने, टैपिलोन साबुन आदि में किया जाता है। इसलिए बीज उत्पादन व रेशा व तेल पर कीटों के पौधे के भाग पर निर्भर करता है।

भूमि और जलवायु :

अलसी की फसल के लिए काली भारी एवं दोमट मटियार मिट्टी उपयुक्त होती है। अधिक उपजाऊ मृदाए अच्छी समझी जाती हैं। भूमि में उचित जल निकास का प्रबंध होना चाहिए। अलसी की फसल को ठंडे व शुष्क जलवायु की आवश्यकता पड़ती है। अतः अलसी भारत वर्ष में अधिकतर रबी मौसम में जहां वार्षिक वर्षा 45-50 सेंटीमीटर प्राप्त होती है वहां इसकी खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है। अलसी के उचित अंकुरण हेतु 25-30 डिग्री से.ग्रे. तापमान तथा बीज बनते समय तापमान 15-20 डिग्री से.ग्रे. होना चाहिए। अलसी के वृद्धि काल में भारी वर्षा व बादल छाये रहना बहुत ही हानिकारक साबित होते हैं। परिपक्वन अवस्था पर उच्च तापमान, कम नमी तथा शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है ।

खेत की तैयारी :

अलसी का अच्छा अंकुरण प्राप्त करने के लिए खेत भुरभुरा एवं खरपतवार रहित होना चाहिए। अतः खेत को 2 से 3 बार हैरो चलाकर पाटा लगाना आवश्यक है जिससे नमी संरक्षित रह सके। अलसी का दाना छोटा एवं महीन होता है। अतः अच्छे अंकुरण हेतु खेत का भुरभरा होना अति आवश्यक है।

बुवाई का समय :

असिंचित क्षेत्रो में अक्टूबर के प्रथम पखवाडे़ में तथा सिचिंत क्षेत्रो में नवम्बर के प्रथम पखवाडे़ में बुवाई करना चाहिये। उतेरा खेती के लिये धान कटने के 7 दिन पूर्व बुवाई की जानी चाहिये। जल्दी बोनी करने पर अलसी की फसल को फली मक्खी एवं पाउडरी मिल्डयू आदि से बचाया जा सकता है ।

बीज एवं बीजोपचार :

अलसी की बुवाई 20 से 25 किग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से करनी चाहिए। कतार से कतार के बीच की दूरी 30 सेंमी तथा पौधे की दूरी 5 से 7 सेंमी रखनी चाहिए। बीज को भूमि में 2 से 3 सेंमी की गहराई पर बोना चाहिए। बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेन्डाजिम की 2.5 से 3 ग्रा. मात्रा प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए अथवा ट्राइकोडर्मा हारजिएनम की 5 ग्राम एवं कार्बाक्सिन को उपचारित कर बुवाई करनी चाहिए।

उर्वरकों की मात्रा :

असिंचित क्षेत्र के लिए अच्छी उपज प्राप्ति हेतु नाइट्रोजन 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस 40 कि.ग्रा. एवं 40 कि.ग्रा. पोटाश की दर से तथा सिंचित क्षेत्रों में 100 किग्रा. नाइट्रोजन व 75 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें। असिंचित दशा में नाइट्रोजन व फॉस्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा तथा सिंचित दशा में नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फॉस्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय चोगे द्वारा 2-3 से.मी. नीचे प्रयोग करें सिंचित दशा में नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा टॉप ड्रेसिंग के रुप में प्रथम सिंचाई के बाद करें। फॉस्फोरस के लिए सुपर फॉस्फेट का प्रयोग अधिक लाभप्रद है। अलसी में भी एजोटोबेक्टर एजोसपाईरिलम और फॉस्फोरस घोलकर जीवाणु आदि जैव उर्वरक उपयोग किए जा सकते हैं। बीज उपचार हेतु 10 ग्राम जैव उर्वरक प्रति किग्रा बीज की दर से अथवा मृदा उपचार हेतु 5 किग्रा हैक्टेयर जैव उर्वरकों की मात्रा को 50 किग्रा भुरभुरे गोबर की खाद के साथ मिलाकर अंतिम जुताई के पहले खेत में बराबर बिखेर देना चाहिए।

खरपतवार प्रबंधन :

खरपतवार प्रबंधन के लिए बुवाई के 20 से 25 दिन पश्चात् पहली निराई-गुड़ाई एवं 40 से 45 दिन पश्चात् दूसरी निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। अलसी की फसल में रासायनिक विधि से खरपतवार प्रबंधन हेतु एलाक्लोर एक कि.ग्रा संक्रिया तत्व को बुवाई के पश्चात् एवं अंकुरण पूर्व 500 से 600 लिटर पानी में मिलाकर खेत में छिड़काव करें।

जल प्रबंधन :

अलसी के अच्छे उत्पादन के लिये विभिन्न क्रांतिक अवस्थाओं पर 2 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।यदि दो सिंचाई उपलब्ध हो तो प्रथम सिंचाई बुवाई के एक माह बाद एवं द्वितीय सिंचाई फल आने से पहले करना चाहिये। सिंचाई के साथ-साथ प्रक्षेत्र में जल निकास का भी उचित प्रबंध होना चाहिये। प्रथम एवं द्वतीय सिचाई क्रमशः 30-35 व 60 से 65 दिन की फसल अवस्था पर करें।

अलसी के प्रमुख कीट :

कर्तन कीट (एग्राटिस एप्सिलान)

प्रबन्धन :

खेतों के पास प्रकाश प्रपंच 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति है. की दर से लगाकर प्रौढ़ कीटों को आकर्षित करके नष्ट किया जा सकता है जिसकी वजह से इसकी संख्या को कम किया जा सकता है।खेतों के बीच-बीच में घास फूस के छोटे-छोटे ढेर शाम के समय लगा देने चाहिए। रात्रि में जब सूंडियां खाने को निकलती है। तो बाद में इन्हीं में छिपेगी जिन्हें घास हटाने पर आसानी से नष्ट किया जा सकता है।प्रकोप बढ़ने पर क्लोरोपायरी फॉस 20 ई. सी. 1 लिटर प्रति है. या नीम का तेल 3 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें।फसल की बुवाई से पूर्व फोरेट (थीमेट) 10 जी. ग्रेन्यूल्स की 20-25 किग्रा. मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें।

अलसी की कली या गालमिज मक्खी (डाईनूरिया लिनी बारनस)

प्रबन्धन :

मैगेट परजीवी चालसिड ततैया सिसटैसिस डैसूनेरी मैगेट की मात्रा को कम करने में सहायक होगा।आवश्यकतानुसार कीटनाशी रसायन साइपरमेथ्रिन 25 प्रतिशत की 350 मि.लि. मात्रा या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस. एल. की 1 मि.लि. मात्रा या डाइमेथोएट 30 ई. सी. या मेटासिसटाक्स 25 इ. सी. 1.25-2.0 मि.लि. प्रति लिटर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें।कार्बारिल 10 प्रतिशत डी0 पी0 25 किलो0 प्रति हैक्टेयर की दर से बुरकाव करें।

लीफ माइनर या पर्णसूरंगक कीट  (फाइटोमाइजा होर्टीकोला)

प्रबंधन :

प्रकोप होने पर 5 प्रतिशत एन.एस.के.ई. का छिड़काव करें।अधिक प्रकोप होने पर थायोमीथोक्सोम 25 डब्लू. पी. 100 जी. या क्लोथिनीडीन 50 प्रतिशत डब्लू. डी.जी. 20-24 ग्राम. 500 लिटर पानी में या डाईमैथोएट 30 ई. सी. का 1.0-1.5 लिटर या मेटासिसटाक्स का 1.5 -2.0 लिटर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

फल भेदक कीट (हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा)

प्रबन्धन:

खेत में 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति है. की दर से लगाए। खेत में परजीवी पक्षियों के बैठने हेतु 10 ठिकाने प्रति है. के अनुसार लगाए। सूंड़ी की प्रथमावस्था दिखाई देते ही 250 एल. ई. का एच. ए. एन. पी. वी. को एक किलोग्राम गुड़ तथा 0.1 प्रतिशत टीपोल के घोल का प्रति है. की दर से 10-12 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त 1 किग्रा. बी. टी. का प्रति है. प्रयोग करें। तदोपरान्त 5 प्रतिशत एन.स.के.ई. का छिड़काव करें। प्रकोप बढ़ने पर क्विनोलफास 25 ई.सी. या क्लोरपायरी फॉस 20 ई. सी. का 2 मिमी. प्रति लि. या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. की 1 मिमी. प्रति लि. की दर से छिड़काव करें। स्पाइनोसैड 45 एस.सी. व थायोमेक्जाम 70 डब्ल्यू एस. सी. की 1 मिमी. प्रति लि. का प्रयोग करें।

 

सेमीलूपर (प्लूसिया ओरिचेल्सिया)

प्रबन्धन :

खेत में 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति है. की दर से लगाएं। खेत में परजीवी पक्षियों के बैठने हेतु 10 ठिकाने प्रति है. के अनुसार लगाएं। प्रकोप बढ़ने पर क्लोरोपायरी फॉस 20 ई. सी. 1 लिटर प्रति है। या नीम का तेल 3 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें।

बिहारी बालदार सूंडी (स्पाइलोसोपा ओबलिक्वा)   

प्रबंधन:

प्रथमावस्था सूंडी दिखाई देते ही एस. ओ. एन. पी. वी. की 250 एल. ई. या  3ग1012 पी. ओ. बी. प्रति है. की दर से 7-8 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।फसल में फालिडाल धूल 2 प्रतिशत का 20-25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए। स्पाइनोसैड 45 एस. सी. इण्डोक्साकार्ब 14.5 एस. सी. व थायोमेक्जाम 70 डब्ल्यू एस. सी. की 1 मिमी. प्रति लि. का प्रयोग करें।

उपज :

अलसी की उपज सामान्यता 20-25 किवंटल प्रति हेक्टयर।

 

 

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