लाल मूली (Red Radish) की खेती

0

लाल मूली भी एक फाइव-स्टार होटल व उच्च श्रेणी के सब्जी बाजार की दुकानों पर अधिक बेची जाती है तथा बाजार में अधिक मांग रहती है | इन लाल मूलियों को अधिकतर सलाद, पराठे एवं कच्ची सब्जी के रूप में अधिक खाया जाता है । इसका छिलका लाल रंग का जो तीखा न होकर कुरकुरा, मुलायम तथा स्वादिष्ट होता हैं ।

इस मूली में दो प्रकार की किस्में होती हैं जो गोलाकार तथा लम्बी आकार की होती हैं । इनको सलाद की सजावट हेतु भी प्रयोग में लाया जाता है । इस सब्जी को अधिकतर कच्चा ही खाया जाता है । इसमें तीखापन नहीं होता है । यह स्वादिष्ट अधिक होती है तथा इसमें पोषक-तत्वों की भी भरपूर मात्रा होती है । भोजन के साथ सेवन से शीघ्र पाचन व खून का शुद्धीकरण करती है । इसका छिलका सहित प्रयोग करना चाहिए ।

लाल मूली की उन्नत खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु 

अन्य मूली (सफेद) की भांति लाल मूली के लिये भी हल्की बलुई दोमट की आवश्यकता होती है । इस मूली को हमेशा मेड़ों पर ही लगाना चाहिए तथा मिट्‌टी में भरपूर जीवांश-पदार्थों की मात्रा का होना नितान्त आवश्यक है । भूमि का पी.एच. मान 6.5-7.5 के बीच का उचित रहता है ।

लाल मूली के लिये भी ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती है । क्योंकि यह भी शरद ऋतु की फसल है जिसको ठन्ड की अधिक जरूरत रहती है । अर्थात् 30-32 डी०सेग्रेड तापमान अधिक उचित रहता है । लेकिन 20- 25 डी०सेग्रेड के तापमान पर अच्छी वृद्धि करती है ।

लाल मूली की उन्नत खेती के लिए खेत की तैयारी

इस फसल के लिये 4-5 जुताइयों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि यह जड़ वाली फसल है जिसको भुरभुरी मिट्‌टी की आवश्यकता पड़ती है । इस प्रकार से 1-2 जुताई मिट्‌टी पलटने वाले हल से तथा देशी हल या ट्रैक्टर ट्रिलर द्वारा करनी चाहिए । इस प्रकार से खेत का ढेले रहित व सूखी घास रहित होना जरूरी है । ढेले ना बनने हेतु प्रत्येक जुताई के बाद पाटा चलाना आवश्यक है । मिट्‌टी बारीक रहे जिससे जड़ें अधिक वृद्धि करें ।

लाल मूली की उन्नत किस्में

लाल मूली- जोकि लम्बी एवं गोलाकार होती है । आमतौर पर इन्हें ही उगाया जाता है ये स्थानीय किस्मों को ही बोया जाता है जिससे अधिक उपज मिलती है ।

1)  रैपिड रेड वाइट ट्रिटड- लम्बी जड़ वाली 2) स्कारलेट ग्लोब- गोलाकार जड़ वाली ही प्रसिद्ध किस्में हैं ।

खाद एवं उर्वरकों की मात्रा

सड़ी गोबर की खाद 8-10 टन प्रति हैक्टर तथा नत्रजन 80 किलो, फास्फोरस 60 किलो तथा पोटाश 60 किलो प्रति हैक्टर देना चाहिए । फास्फोरस व पोटाश एवं आधी नत्रजन बुवाई से पहले दें तथा शेष नत्रजन की बची आधी मात्रा को 15-12 दिन बाद टोप-ड्रेसिंग के रूप में खड़ी फसल में दें ।

बीज की मात्रा

बीज की मात्रा प्रति हैक्टर 8-10 किलो पर्याप्त होती है लेकिन बुवाई छिटककर करनी हो तो 12-15 किलो प्रति हैक्टर की आवश्यकता पड़ती है ।

बुवाई का समय एवं विधि 

बुवाई का उचित समय मध्य सितम्बर से अक्टूबर का माह होता है क्योंकि अगेती फसल की अधिक मांग होती है ।

बुवाई की विधि सर्वोत्तम पंक्तियों में मेड् बनाकर बोना चाहिए । पेड़ों को 6-8 इंच ऊंची तथा 10-12 इंच चौड़ी बनाकर ऊपरी सतह पर 10-12 सेमी. की दूरी पर बीज को 2-3 मिमी. की गहराई पर बोना चाहिए जिससे शत-प्रतिशत बीज अंकुरित हो सकें । गहरा बीज कम अंकुरित हो पाता है । मेड से मेड की दूरी 45 सेमी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 8-12 सेमी. रखते हैं ।

सिंचाई 

मूली को सर्वप्रथम पलेवा करके जुताई करें तब बीज को बायें | जब बीज अंकुरित होकर 10-12 दिन की फसल हो जाये तो प्रथम सिंचाई करनी चाहिए तथा अन्य सिंचाई 10-12 दिन के अन्तराल से करनी चाहिए । इस प्रकार से  8-10 सिंचाई पर्याप्त होती हैं । पानी की मात्रा कम देते हैं जिससे मेड़ें डूब न पायें ।

निकाईगुड़ाई

इस फसल में अधिक निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता नहीं पड़ती । क्योंकि 40 दिन में फसल तैयार हो जाती है तथा कोई जंगली घास या पौधे उग भी आते हैं तो हाथ से उखाड़ा जा सकता है । इस प्रकार से आवश्यकता पड़ने पर जंगली घास निकालने के लिये एक-दो निकाई-गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है ।

मिट्‌टी चढ़ाना

मूली बोने हेतु गूल बनाना आवश्यक है क्योंकि यह जड़ वाली फसल है, इसकी पैदावार गूलों पर बोने से अधिक मिलती है । मिट्‌टी बाद में कम चढ़ाई जाती है । मोटे आकार की धूल पर अधिक बीज लगता है ।

मूली को उखाड़ना

तैयार मूली को खेत में से निकालते रहना चाहिए । इस प्रकार से मूली की जड़ों को साफ करके पत्तियों सहित बाजार या सब्जी की दुकानों पर बिक्री के लिये भेजते हैं । ताकि जड़ व पत्तियां मुरझा ना पायें, ताजी बनी रहें ।

उपज

उपज अच्छी देखभाल होने पर 20-25 क्विंटल प्रति हैक्टर तक पर्याप्त होती है । जड़ों को अधिक दिन की ना करें अन्यथा बीज से खराब हो जाती है । समय पर खोदना चाहिए ।

बीमारियां एवं कीट नियन्त्रण 

बीमारी अधिकतर पत्तियों पर धब्बे लगाने वाली लगती है । जिसका-नियन्त्रण फफूंदीनाशक बेवस्टीन से बीज उपचारित करके बोयें तथा 0.2% के घोल का स्प्रे करें ।

कीट अधिक एफिडस, सुण्डी अधिक लगती है । रोकथाम के लिये रोगोर, मेलाथियोन का 1% का घोल बनाकर स्प्रे करने से नियन्त्रण हो जाता है ।



महत्वाची सूचना :- सदरची माहिती हि कृषी सम्राट यांच्या वैयक्तिक मालकीची असून आपणास इतर ठिकाणी ती प्रसारित करावयाची असल्यास सौजन्य:- www.krushisamrat.com असे सोबत लिहणे गरजेचे आहे.

सदर सत्रासाठी आपण ही आपल्या कडील माहिती / लेख इतर शेतकऱ्यांच्या सोयीसाठी [email protected] या ई-मेल आयडी वर किंवा 8888122799 या नंबरवर पाठवू शकतात. आपण सादर केलेला लेख / माहिती आपले नाव व पत्त्यासह प्रकाशित केली जाईल.



Leave A Reply

Your email address will not be published.