कुसुम मकी खेती

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कुसुम की फसल मुख्यत: तेल के लिए उगाई जाती है। कपड़े व खाने के रंगों में कुसुम का प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में कृत्रिम रंगों का स्थान, कुसुम से तैयार रंग के द्वारा ले लिया गया है। इसके दानों में 32% तक तेल पाया जाता है। तेल खाने, पकाने व प्रकाश के लिए जलाने के काम आता है। यह साबुन, पेण्ट, वार्निश, लिनोलियम तथा इनसे संबंधित पदार्थों को तैयार करने के काम में भी लिया जाता है। कुसुम के तेल का प्रयोग विभिन्न दवाइयों के रूप में भी किया जाता है। इसे उत्तेजक दवाई व दस्तावर दवाई के रूप में काम में लेते हैं। हरे पौधों को पशुओं के लिए चारे के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इससे साइलेज भी तैयार की जाती है। इसके हरे भागों से सब्जी भी तैयार की जाती है। इसकी खली पशुओं को खिलाने या खाद के रूप में खेती में प्रयोग की जा सकती है।

भूमि का चुनाव एवं तैयारी

अच्छे उत्पादन के लिये कुसुम फसल के लिये मध्यम काली भूमि से लेकर भारी काली भूमि उपयुक्त मानी जाती है। कुसुम की उत्पादन क्षमता का सही लाभ लेने के लिये इसे गहरी काली जमीन मे ही बोना चाहिये। इस फसल की जड़ें जमीन में गहरी जाती है।

 

जातियों का चुनाव

(i) टा. 65 (के.65)_ फसल अवधि 175-190 दिन, दानों में तेल 30-35% उपज शुष्क क्षेत्रों में अच्छे प्रबंध में 12-14 कुंतल/हेक्टेयर, आल्टरनेरिया लीफ ब्लाइट से प्रभावित होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बुंदेलखंड में इस किस्म को बोने की सिफारिश की गई है।

 

(ii)  HUS-305 (मालवीय कुसुम 305)_ किसान भाइयों यह किस्म 1986 में विकसित की गयी है। फसल अवधि 160-170 दिन है। दानों में तेल 30-35% तक पाया जाता है। आल्टरनेरिया लीफ ब्लाइट की सहनशील है। इससे 12-13 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती हो जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए इसकी संस्तुति की गयी है।

 

(iii) 6503 _ पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं पश्चिमी बिहार के लिये उपयुक्त है। इससे 15-20 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हो जाती है। फसल अवधि 160-170 दिन है।

 

फसल चक्र

इस फसल को सूखा वाले क्षेत्र या बारानी खेती में खरीफ मौसम में किन्हीं कारणों से फसलों के खराब होने के बाद आकस्मिक दशा में या खाली खेतों में नमीं का संचय कर सरलता से उगाया जा सकता है। खरीफ की दलहनी फसलों के बाद द्वितीय फसल के रुप में जैसे सोयाबीन, मूंग, उड़द या मँगफली के बाद रबी में द्वितीय फसल के रुप में कुसुम को उगाया जा सकता है। खरीफ में मक्का या ज्वार फसल ली हो तो रबी मौसम में कुसुम फसल को सफलता से उगाया जा सकता है।

 

बीजोपचार

कुसुम फसल के बीजों को बोनी करने के पूर्व बीजोपचार करना आवश्यक है, जिससे कि फफूंद से लगने वाली बीमारियों न हो। बीजों का उपचार करने हेतु 3 ग्राम थायरम या ब्रासीकाल फफंँदनाशक दवा प्रति एक किलोग्राम स्वस्थ्य बीज के लिये पर्याप्त है।

बोने का समय

मूँग या उड़द यदि खरीफ मौसम में बोई गई हो तो कुसुम फसल बोने का उपयुक्त समय सितम्बर माह के अंतिम से अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह तक है। यदि खरीफ फसल के रुप में सोयबीन बोई है तो कुसुम फसल बोने का उपयुक्त समय अक्टूबर माह के अंत तक है। बारानी खेती है और खरीफ में कोई भी फसल नहीं लगाई हो तो सितम्बर माह के अंत से अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह तक कुसुम फसल सफलतापूर्वक बो सकते हैं।

 

बोने की विधि

8 किलोग्राम कुसुम का बीज प्रति एकड़ के हिसाब से दुफन या फड़क से बोना चाहिये। बोते समय कतार से कतार की दूरी 45 से.मी. या डेढ़ फुट रखना आवश्यक है। पौधे से पौधे की दूरी 20 से.मी. या 9 इंच रखना चाहिये।

 

खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की विधि

असिंचित अवस्था में नत्रजन 16 किलोग्राम, स्फुर 16 किलोग्राम एवं 8 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की दर से देना चाहिये। सिंचित स्थिति में 24:16:8 किलोग्राम नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश प्रति एकड़ पर्याप्त है।

 

हर तीसरे वर्ष में एक बार 8-10 गाड़ी गोबर की पकी हुई खाद प्रति एकड़ भूमि में मिलाना फायदेमंद रहता है। तिलहनी फसल होने की वजह से गंधक की मात्रा 8 -10 किलोग्राम प्रति एकड़ देना उचित रहेगा।

 

उर्वरक की सम्पूर्ण मात्रा असिंचित अवस्था में बोनी के समय ही भूमि में दें। सिंचित स्थिति में नत्रजन की आधी मात्रा, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के समय दें और, शेष नत्रजन की आधी मात्रा प्रथम सिंचाई के समय दें।

 

सिंचाई

यद्दपि कुसुम की खेती वर्षा के आधार पर की जाती है, परंतु दो सिंचाई, पहली बोने के 30 दिन बाद व दूसरी फूल आते समय देने पर, असिंचित खेतों की तुलना में, काफी उपज प्राप्त होती है। फसल में आवश्यकता अनुसार जल निकास अत्यंत आवश्यक है। थोड़े समय तथा तक खेत में पानी ठहरने से फसल नष्ट हो सकती हैं।

निदाई-गुड़ाई

कुसुम फसल में एक बार डोरा अवश्य चलायें तथा एक या दो बार आवश्यकतानुसार हाथ से निदाई-गुड़ाई करें। निदाई-गुड़ाई करने से जमीन की उपरी सतह की पपड़ी टूट जायेगी। यदि दरारे पड़ रहीं हो तो वह भर जायेगी और नमीं के हास की बचत होगी। निदाई-गुड़ाई अंकुरण के 15-20 दिनों के बाद करना चाहिये एवं हाथ से निदाई करते समय पौधों का विरलन भी हो जायेगा। एक जगह पर एक ही स्वस्थ पौघा रखना चाहिये।

 

पौध संरक्षण

कीट

 

कुसुम फसल में सबसे ज्यादा माहो की समस्या रहती है। यह प्रथम किनारे के पौधों पर दिखता है। यह पत्तियों तथा मुलायम तनों का रस चूसकर नुकसान पहुँचाता है। माहो द्वारा पौधों को नुकसान न हो, इसलिये मिथाइल डेमेटान 25 ई.सी. का 0.05 प्रतिशत या डाईमिथियोट 30 ई.सी. का 0.03 प्रतिशत या ट्राइजोफास 40 ई.सी. का 0.04 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन बाद दुबारा छिड़काव करें।

 

कुसुम की फल छेदक इल्ली

 

पौधों में जब फूल आना शुरु होते हैं तब इसका प्रकोप देखा जाता है। इसकी इल्लियाँ कलियों के अंदर रहकर फूल के प्रमुख भागों को नष्ट कर देती हैं। इसकी रोकथाम के लिये इंडोसल्फान 35 ई.सी. का 0.07 प्रतिशत या क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. का 0.04 प्रतिशत या डेल्टामेथ्रिन का 0.01 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें।

रोग

कुसुम फसल में रोगों की कोई विशेष समस्या नहीं है। रोग या बीमारियाँ हमेशा वर्षा के बाद अधिक आर्द्रता की वजह से खेत में फैली गंदगी से, एक ही स्थान पर बार-बार कुसुम की फसल लेने से होती है। अत: उचित फसल चक्र अपनाना, बीज उपचारित कर बोना व ,खेत में स्वच्छता रखकर, जल निकास का अच्छा प्रबंध करने से बीमारियाँ नहीं आयेगी।

 

(i) उकठा _ यह बीमारी स्क्लेरोटिनिया स्क्लेरोटिनम नामक फफूंदी से लगती है। सिंचित अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निकास उचित नहीं होता, इसका प्रभाव अधिक पाया जाता है। प्रभावित पौधे मृदा आधार या मृदा में नीचे सफेद मोटी रचना प्रदर्शित करते हैं।

  • रोगरोधी किस्में HUS-305 आदि उगायें तथा खेतों को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। रोगग्रसित पौधे उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए।

 

(ii) गेरुई _ यह पक्सीनिया कार्थेमी नामक फफूंद से लगता है। पतियों पर धब्बे दिखाई पड़ते हैं। रोगरोधी किस्मों को उगाना चाहिए। बीज को सदैव एग्रोसन जी. एन. या कैप्टान या थीरम से उपचारित करके बोना चाहिए। रोग का फसल पर प्रभाव होते ही डाइथेन एम-45 या डाइथेन जैड 78 का 0.25% घोल का छिड़काव 8-10 दिन के अन्तर पर करना चाहिए। खेत की सफाई रखना भी इस रोग के फैलाव को रोकता है।

 

(iii) आल्टरनेरिया लीफ ब्लाइट_ फसल में इस रोग से कभी-कभी 25-42% तक कमी आ जाती है। इस बीमारी से फसल को बचाने के लिए डाइथेन एम 45 की 2 किग्रा मात्रा 1,000 लीटर पानी में घोलकर 10-15 दिन के अन्तर पर छिड़काव करें। सहनशील जाति HUS-305 उगाये ।

 

फसल कटाई

कांटेवाली जाति में काँटो के कारण फसल काटने में थोड़ी कठिनाई जरुर आती है। काँटेवाली फसल में पत्तों पर काँटें होते हैं। तने कांटे रहित होते हैं। बाँये हाथ्ज्ञ में दास्ताने पहनकर या हाथ में कपड़ा लपेटकर या तो दो शाखा वाली लकड़ी में पौधों को फंसाकर दराते से आसानी से फसल कटाई कर सकते हैं। काँटे रहित जातियों की कटाई में कोई समस्या नहीं हैं। बहुत अधिक में कुसुम फसल का रकबा हो तो कम्बाइन हार्वेस्टर से भी कटाई कर सकते हैं।

उपज

जे.एस.एफ. – 1 जाति की पैदावार 680 किलोग्राम प्रति एकड़ प्राप्त होती हैं

जे.एस.एफ. – 7 जाति की पैदावार 520 किलोग्राम प्रति एकड़ प्राप्त होती है

जे.एस.एफ. – 73 जाति की पैदावार 580 किलोग्राम प्रति एकड़ प्राप्त होती है।

 

 

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