अक्टूबर में ली जाने वाली फसल कि जानकारी

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अक्टूबर माह जिसे आश्विन-कार्तिक माह भी कहते है, मुख्यतः त्योहर्रों के लिए प्रसिद्ध है,  वहीँ खरीफ फसलों की भरपूर पैदावार भी एक मुख्य कारण है तो दूसरी तरफ रबी मौसम की तैयारी भी शुरू करने का है ।

फसलोत्पादन

धान

धान की कटाई से एक सप्ताह पहले खेत से पानी निकाल दें । जब पोधे पीले पडने लगे तथा वालियां लगभग पक जायें तो कटाई उन्नत हासिएं या कवाईन मशीनों से करें । देर करने पर दाने खेत में ही झड़ जाते हैं तथा पैदावार कम मिलती है । सूखी फसल की गहाई पैडी सोशर से भी कर सकते है । धान को १२ प्रतिशत नमी तक सुखाकर भण्डारण करें ।

कपास

देशी कपास की चुनाई ८-१० दिन के अन्तर पर करते रहे । अक्टूबर में अमेरिकन कपास भी चुनाई के लिए तैयार है,  इसे १७-२० दिन के अन्तर पर चुने व सूखें गोदामों में रखें । यदि चित्तीदार सूडी,  गुलाबी सुंडी,  कुबडा कोडा का प्रकोप नजर आये तो जुलाई में बताई विधि से दवाईयों का छिडकाव करें ।

शीतकालीन मक्का

  • सिंचार्इ की समुचित व्यवस्था होने पर मक्का की बोआर्इ अक्टूबर के अन्त में की जा सकती है।
  • संकर प्रजातियों के लिएप्रति हेक्टेयर 18-20 किग्रा व संकुल प्रजातियों के लिए 20-25 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है।

शरदकालीन गन्ना

अक्टूबर माह के आखरी सप्ताह में शरदकालीन गन्ना लग सकता है जिसमें लाईनें २ फुट दूर रखें यदि लाईनें ३ फुट दूर रखें तो बीच में एक लाईन आलू लगा दें । आलू के लिए खाद अतिरिक्त दें । वाकी कृषि क्रियाओं के लिए अप्रैल का लेख देखें । गन्ने में २७ दिनों के अन्तर पर सिंचाई करते रहे । अक्टूबर में पायरिल्ला (घोडा) कोडा गन्ने का रस चूसता है तथा गुरदासपुर व अगोला वेधक गन्ने में सुराख कर देते है । इनकी रोकथाम के लिए अप्रैल व जून माह के लेख देखें । कीड़ाग्रस्त क्षेत्रों में पानी खडा न रहने दें तथा गन्ने के निचले भाग से २-३ बार पत्तियां उतारने के बाद ०.१ प्रतिशत मैलाथियान छिडकें । रत्ता, सोका या कंडुआ रोग लगने की दशा में रोगी पोधे को खेत से निकाल दें तथा मोढ़ी फसल न लें तथा अनन्य फसल चक्र अपनाएं |

चना

चना अच्छी जल निकास वाली दोमट रेतीली तथा हल्की मिड़ियों में अच्छा होता है । खारी व कल्लर वाली मिट्टी जहां पी.एच ८.५ से अधिक, सेमवाली या जहां पानी का स्तर ऊंचा हैं, चना न लगाये | बारानी क्षेत्रों में देसी चना १०-२५१ अक्टूबर तक लगा दें ।

  • चना की बोआर्इ माह के दूसरे पखवाड़े में करें।
  • पूसा-256, अवरोधी, राधे, के-850 तथा ऊसर क्षेत्र में बोआर्इ के लिए करनाल चना-1 अच्छी प्रजातियाँ हैं।
  • काबुली चना की चमत्कार, पूसा-1003, शुभ्रा अच्छी किस्में हैं।
  • बोआर्इ के समय कूंड़ में याअंतिम जुतार्इ के समय 100-150 किग्रा डी.ए.पी. का प्रयोग करें।

मटर

  • मटर की बोआर्इ माह के दूसरे पखवाड़े में करें।
  • इसे अक्टूबर अन्त से १७ नवम्बर तक लगाते है ।
  • रचना, पन्त मटर-5, अपर्णा, मालवीय मटर-2, मालवीय मटर-15, शिखा एवं सपना अच्छी प्रजातियाँ हैं।
  • दाने के लिए प्रति हेक्टेयर 80-100 किग्रा तथा बौनी किस्मों के लिए 125 किग्रा बीज आवश्यक होगा।
  • बोआर्इ के समय प्रति हेक्टेयर 20 किग्रा नाइट्रोजन, 60 किग्रा फास्फेट व 30-40 किग्रा पोटाश का प्रयोग करें।

गेहूँ

बारानी क्षेत्रों में गेहूं, खरीफ मौसम की बची-खुची नमी के सहारे, अक्टूबर माह के चौथे सप्ताह से बीज सकते है जबकि तापमान लगभग २२० सैल्सियस होना चाहिए । गेहूँ बोने का कार्य अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से प्रारम्भ करें। बीजाई के समय आधा बोरा यूरिया, एक बोरा सिंगल सुपरफासफेट , आधा बोरा म्यूरेट आफ पोटास तथा १०-२५ कि.ग्रा. जिंक सल्फेट डालेँ । खरपतवारनाशक ३ सप्ताह बाद तथा पहली सिंचाई से १-२ दिन पहले छिडके ।

जौ

  • असिंचित क्षेत्रों में जौ की बोआर्इ 20 अक्टूबर से शुरू कर सकते हैं।
  • असिंचित क्षेत्रों के लिए के-141, के-560 (हरितिमा), गीतांजलि, लखन तथा उसरीली भूमि के लिए आजाद अच्छी किस्म है।
  • प्रति हेक्टेयर बोआर्इ के लिए 80-100 किग्रा बीज का प्रयोग करें।

 

 

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