जरबेरा लागवड

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परिचय :

जरबेरा अपनी सुन्दरता के कारण दस महत्वपूर्ण कर्त्तन फूलों में एक अलग स्थान रखता है। व्यापारिक फूलों में इसे बहुत ही पसंद किया जाता है। विभिन्न रंगों में पाए जाने के कारण इसे क्यारियों, गमलों और रॉक गार्डेन में लगाया जाता है।

उत्पत्ति :

जरबेरा बहुवर्षीय, तना रहित पौधा है। इस फूल का उत्पत्ति स्थान दक्षिण अफ्रीका और एशिया महाद्वीप माना जाता है। यह एस्टेरेसी कुल का पौधा है। जरबेरा वंश में 40 जातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें सिर्फ जरबेरा जेमीसोनी जाति को ही फूलों के लिए लगाया जाता है। यह एस्टेरेसी कुल का पौधा है।

भारत में जरबेरा कट फूल के प्रमुख उत्पादक राज्य :-

पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल और अरुणाचलप्रदेश।

भारत में जरबेरा की अधिक उपजाऊ वाली संकर किस्में- Growing-Gerbera-Flowers.-600×330

लाल रंगीन- रुबी रेड, डस्टी, शानिया, साल्वाडोर, तमारा, फ्रेडोरेल्ला, वेस्टा और रेड इम्पल्स

पीला रंगीन- सुपरनोवा, नाडजा, डोनी, मेमूट, यूरेनस, फ्रेडकिंग, फूलमून, तलासा और पनामा

नारंगी रंगीन- कोजक, केरैरा, मारासोल, ऑरेंज क्लासिक और गोलियाथ

गुलाबी रंगीन- रोजलिन और सल्वाडोर

मलाई रंगीन- फरीदा, डालमा, स्नो फ्लेक और विंटर क्वीन

सफेद रंगीन- डेल्फी और व्हाइट मारिया

बैंगनी रंगीन- ट्रीजर और ब्लैकजैक

गुलाबी रंगीन- टेराक्वीन, पिंक एलीगेंस, एसमारा, वेलेंटाइन और मारमारा

मिट्टी एवं जलवायु :

फूलों की अच्छी पैदावार के लिए जल निकास वाली उपजाऊ, हल्की और उदासीन से हल्की क्षारीयमिट्टी उपयुक्त होती है। मिट्टी का पी. एच. मान 5.0 से 7.2 रहने पर फूल अधिक खिलते हैं तथा फूल के डंठल लम्बे निकलते हैं।

जरबेरा उष्ण और समशीतोष्ण जलवायु में खुली जगहों पर लगाया जाता है, परन्तु शीतोष्ण जलवायु में इसे हरित घर में लगाया जाता है। यह पौधा ठंडे मौसम में धूप पसंद करता है तथा गर्मी के मौसम में हल्की छाया की जरूरत होती है। जाड़े में खराब रोशनी से फूल कम खिलते हैं।

 

पौध रोपण :

 

जरबेरा के पौधे को 1 से 1.2 मीटर चौड़ी तथा 20 सें. मी. ऊँची क्यारियों में 30 30 सें.मी. की दूरी पर रोपना चाहिए। पौधा रोपने के पहले क्यारियों की लम्बाई अपनी आवश्यकता अनुसार रखकर उसमें प्रचुर मात्रा में कार्बनिक खाद या पत्ती खाद, या केचुआ खाद इत्यादि मिलाना चाहिए तथा उस बेड को रासायनिक दवा से उपचारित कर ही उसमें पौधे को लगाना चाहिए, नहीं तो रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है। जून-जुलाई में पौधा लगाने से फूल अधिक खिलते हैं।

 

खाद एवं उर्वरक :

 

जल निकास वाले माध्यम में जरबेरा को जमीन और गमले में लगा सकते है। खाद एवं उर्वरक का प्रयोग समय-समय पर करने से पौधे विकास और वृद्धि के साथ फूल उत्पादन भी अच्छा करते है। खाद एवं उर्वरक का उपयोग मिट्टी जाँच के आधार पर करना चाहिए।

अच्छे फूल उत्पादन के लिए 1000 वर्ग मीटर जगह में 13 कि.ग्रा. यूरिया, 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट और 10 कि. ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रत्येक महीना के हिसाब से वानस्पतिक वृद्धि के लिए 3 महीना तक देते रहते है। वानस्पतिक वृद्धि पूर्ण होने के बाद 13 कि.ग्राम यूरिया, 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 13 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश इतनी ही जगह में 6 महीना तक प्रत्येक महीना देते हैं। सूक्ष्म पोषक तत्व में बोरोन, जिंक, कैल्सियम, मैग्निशियम का प्रयोग करने पर फूल की गुणवत्ता अच्छी होती है।

 

प्रसारण :

 

जरबेरा का प्रसारण बीज एवं वानस्पतिक विधि द्वारा किया जाता है। बीज से प्रसारण में फूलों की गुणवत्ता में परिवर्तन होने के कारण इसका प्रसारण वानस्पतिक विधि के विभाजन, कर्त्तन या उत्तक संवर्धन से करने पर मातृ पौधे जैसे फूलों का उत्पादन होता है।

 

(1) बीज द्वारा : फूलों में बीज बनने की प्रक्रिया 10 से 12 बजे सुबह परागण द्वारा उष्ण एवं धूपयुक्त जगहों पर होती है। अप्राकृतिक ढंग से परागण से अधिक मात्रा में बीज बनते हैं। बीज को जल्द से जल्द निकाल कर अंकुरण कराने पर अंकुरण अच्छा होता है। बीज के अंकुरण में 5-6 सप्ताह का समय लगता है, जो डेढ़ से दो साल में फूल देते हैं।

(2) विभाजन : जब पौधे गुच्छे में हो जाते हैं तब बरसात के मौसम में पौधे का विभाजन कर पौधे बनाए जाते हैं।

(3) कर्त्तन : जरबेरा के पौधे को 3 सप्ताह पूर्व ही सिंचाई बंद कर उसकी जड़ों को काट देना चाहिए। तनों को ऐसा काटना चाहिए कि उसमें कलियाँ हों। उस कटे हुए भाग में रुटेक्स दवा का प्रयोग कर 25-300 सेंटीग्रेड तापमान तथा 80% आर्द्र वाली जगह पर लगा देना चाहिए। पौधे बनने में 2 से 3 महीने लगते हैं। इस प्रक्रिया से मातृ पौधे से 40-50 पौधे 2-3 महीने में बनाए जा सकते हैं।

(4) सूक्ष्म प्रसारण :

उत्तक संवर्धन द्वारा रोग मुक्त पौधे तैयार किए जाते हैं। पौधे के अग्र भाग, कलियों, फूलों के उत्तक से उत्तक संवर्धन द्वारा प्रयोगशाला में नये पौधे तैयार किये जाते हैं।

 

सिंचाई :

जरबेरा गहरी जड़ वाला पौधा होने के कारण इसमें हल्की सिंचाई की आवश्यकता हमेशा रहती हैं। किसी भी अवस्था में सिंचाई की कमी उसकी वृद्धि, गुणवत्ता तथा फूल के उत्पादन को प्रभावित करती है। जाड़े में 10-12 दिनों के अंतराल पर तथा गर्मियों में 6-7 दिनों के अंतराल पर हल्की सिंचाई करते रहनी चाहिए। हरित घर में लगे पौधे की सिंचाई टपकन विधि से आवश्यकता अनुसार करते रहनी चाहिए।

घास-फूस नियंत्रण :-

जरबेरा की खेती में घास-फूस नियंत्रण एक महत्वपूर्ण अभियान है और यह कार्य पौधारोपन की शुरुआत के तीन महीने तक दो सप्ताह में एक बार करना चाहिए। तीन महीने के बाद, अगला घास-फूस नियंत्रण का कार्य 30 दिनों के अंतराल पर किया जाना चाहिए। जब कभी जरूरत हो हाथ से घास-फूस को निकालने का काम करना चाहिए। निम्न घास-फूस नियंत्रण अभियान का पालन करें-

– आठ सप्ताह (दो महीने) के जरबेरा फूल की कली को निकाल दें और उसके बाद पुष्पन यानी विकसित होने के लिए छोड़ दें।

– जड़ों में पानी, खाद के अच्छी तरह अवशोषण के लिए और जड़ों में हवा के अच्छी तरह आवागमन के लिए दो सप्ताह में एक बार मिट्टी को उलट-पलट कर दें।

– हमेशा पुरानी पत्तियों को हटा दें ताकि नई पत्तियां विकास कर सकें।

हानिकारक कीट और बीमारियां :-

जरबेरा के पौधे में पाए जाने वाले प्रमुख कीट-whiteflies

एफिड्स- इस पर नियंत्रण के लिए दो एमएल पानी में डिमेथोएट 30 ईसी मिलाकर छिड़काव करें।

थ्रिप्स- इस पर नियंत्रण के लिए दो एमएल पानी में डिमेथोएट 30 ईसी मिलाकर छिड़काव करें।

व्हाइटफ्लाई- इस पर नियंत्रण के लिए दो एमएल पानी में डिमेथोएट 30 ईसी मिलाकर छिड़काव करें।

रेड स्पाइडर माइट- इस पर नियंत्रण के लिए 0.4 एमएल पानी में अबामेसटीन 1.9 ईसी मिलाकर छिड़काव करें।

नेमाटोड- इस पर नियंत्रण के लिए पौधारोपन के वक्त मिट्टी में ढाई किलोग्राम सूडोमोनासफ्लूरेसेंस प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें।

मुख्य रोग :-

फूल की कली का सड़ जाना- इस पर नियंत्रण के लिए प्रति लीटर पानी में दो ग्राम की दर से कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को मिलाकर छिड़काव करें।

पाउडर फफूंद- इस पर नियंत्रण के लिए अजोक्सीस्ट्रोबिन की एक ग्राम मात्रा एक लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

फसल कटाई :-

आमतौर पर पौधारोपन के तीन महीने के बाद जरबेरा के पौधे में पुष्पण शुरू हो जाता है। जब फूल पूरी तरह खुले हुए होते हैं या डंठल में बाहरी फूल की दो से तीन कतारें सीधी खड़ी रेखा में आ जाती हैं तब फसल की कटाई की जाती है। फूल की जिंदगी को और लंबा करने के लिए फूल के डंठल को सोडियम हाइपोक्लोराइड (6 से 7 मिली प्रति एक लीटर में) के घोल में पांच घंटे के लिए डूबा देना चाहिए।


फसल कटाई के बाद :-

डंठल के आधार से करीब दो से तीन सेमी उपर काटना चाहिए और उसे ताजा क्लोरीन मिले पानी में रखना चाहिेए। फूल को छांट लेना चाहिए, एकरुपता के लिए क्रम में लगा देना चाहिए और कार्टून के बक्से में पैक कर देना चाहिए।

पैदावार :-

कोई भी फसल की पैदावार खेत प्रबंधन के तौर-तरीकों और मिट्टी की किस्मों पर निर्भर करता है। खुले तौर पर और पौधा घरों में जरबेरा की खेती करने से निम्न पैदावार होती है-

– खुले मैदान में या जालीदार शेड की खेती- 140 से 150 कटे हुए फूल प्रति वर्ग मीटर प्रति साल पैदावार की आस होती है।

– पौधा घरों में खेती- 225 से 250 कटे हुए फूल प्रति वर्ग मीटर प्रति साल हासिल किया जा सकता है।

 

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