सौंफ की खेती

0

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद में 3 से 4 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके खेत को समतल बनाकर पाटा लगते हुए एक सा बना लिया जाता हैI आख़िरी जुताई में 150 से 200 कुंतल सड़ी गोबर की खाद को मिलाकर खेत को पाटा लगाकर समतल कर लिया जाता हैI
सौंफ की खेती मुख्या रूप से मसाले के रूप में की जाती हैIसौंफ के बीजोसे OLE TILE(०.7-1.2 %)तेल भी निकाला जाताहै.इसकी खेती मुख्य रूप से गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश,कर्नाटक,आँध्रप्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा में की जाती हैI

  • सौंफ की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु एवं भूमि :

 

इसकी खेती शरद (बरसात) ऋतु में अच्छी तरह से की जाती है, फसल पकते समय शुष्क(कमबारीश)जलवायु की आवश्यकता पड़ती हैI बीज बनते समय अधिक ठंडी की आवश्यकता नहीं पड़ती हैI सौंफ की बलुई जमीन को छोड़कर हर प्रकार की जमीन में की जा सकती है, लेकिन जल निकास का उचित प्रबंध होना अति आवश्यक है, फिर भी दोमट भूमि सर्वोत्तम होती हैI

 

  • खेत की तैयारी :

 

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद में 3 से 4 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके खेत को समतल बनाकर पाटा लगते हुए एक सा बना लिया जाता हैI आख़िरी जुताई में 150 से 200 कुंतल सड़ी गोबर की खाद को मिलाकर खेत को पाटा लगाकर समतल कर लिया जाता हैI

 

  • उन्नतशील प्रजातियां :

सौंफ की बहुत सी प्रजातियां पाई जाती है जैसे कि सी.ओ.1, गुजरात फनेल 1, आर.ऍफ़ 35,आर.ऍफ़101,आर.ऍफ़125, एन पी.डी. 32 एवं एन पी.डी.186, एन पी.टी.163, एन पी. के.1, एन पी.जे.26, एन पी.जे.269 एवं एन पी.जे131, पी.ऍफ़ 35, उदयपुर ऍफ़ 31, उदयपुर ऍफ़ 32, एम्. एस.1 तथा जी.ऍफ़.1 आदि हैI

 

  • सौंफ की बुवाई तथा विधि :


अक्टूबर माह बुवाई के लिए सर्वोत्तम माना जाता हैI लेकिन 15 सितम्बर से 15 अक्टूबर तक बुवाई कर देना चाहिएI बुवाई लाइनो में करना चाहिए तथा छिटककर भी बुवाई की जाती हैI तथा लाइनो में इसकी रोपाई भी की जाती हैI रोपाई में लाइन से लाइन की दूरी 60 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखनी चाहिएI जब पौध रोपण दवारा खेती की जाती है तो 7 से 8 सप्ताह पहले रोपाई से पौध डालकर की जाती हैI

 

  • सिंचाई :
    पौध रोपाई के बाद पहली हल्की सिंचाई करनी चाहिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिएI बीज बनते तथा पकते समय अवश्य सिंचाई करनी चाहिएI

 

  • सौंफ की फसल में निराई-गुड़ाई :

    पहली सिंचाई के बाद निराई-गुड़ाई करना आवश्यक रहता है तथा 45 से 50 दिन बाद दूसरी निराई गुड़ाई करना आवश्यक होता हैI बड़ी फसल होने पर निराई-गुड़ाई करते समय पौधे टूटने का भय रहता हैI

  • रोग एवं उनकी रोकथाम :

सौंफ में पाउडरी मिल्ड्य, उकठा या विल्ट रोग लगते हैI इनको रोकने के लिए 0.3 प्रतिशत जल ग्राही सल्फर अथवा 0.06 प्रतिशत कैराथीन के घोल का छिड़काव करना चाहिए तथा अवरोधी प्रजातियों का भी प्रयोग करना चाहिएI

 

  • फसल कटाई:

    सौंफ के अम्बेल जब पूरी तरह विकसित होकर और बीज पूरी तरह जब पककर सूख जावे तभी गुच्छो की कटाई करनी चाहिएI कटाई करके एक से दो दिन सूर्य की धुप में सुखाना चाहिए तथा हरा रंग रखने के लिए 8 से 10 दिन छाया में सूखाना चाहिएI हरी सौंफ प्राप्त करने हेतु फसल में जब अम्बेल के फूल आने के 30 से 40 दिन गुच्छो की कटाई करनी चाहिएI कटाई के बाद छाया में ही अच्छी तरह सूखा लेना चाहिएI

 

इस सत्र के लिए हम किसानों की सुविधा के लिए, यह जानकारी अन्य किसानों की सुविधा के लिए लेख आप [email protected] ई-मेल आईडी या 8888122799 नंबर पर भेज सकते है, आपके द्वारा सबमिट किया गया लेख / जानकारी आपके नाम और पते के साथ प्रकाशित की जाएगी।

Leave A Reply

Your email address will not be published.