कृषि अर्थशास्त्र के विभाग ( Divisions of Agricultural Economics )

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वर्तमान में, कृषि अर्थशास्त्र की विषय सामग्री में अत्यधिक विस्तार होता जा रहा है । इसलिए अध्ययन की सुविधा को ध्यान में रखकर कृषि अर्थशास्त्र को कुछ विभागों में विभक्त किया गया है जो परस्पर एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित एवं एक-दूसरे पर आश्रित हैं । इन विभागों को अग्रवत व्यक्त किया जा सकता है :

कृषि अर्थशास्त्र और औद्योगिक अर्थशास्त्र में अन्तर

(Difference Between Agricultural Economics and Industrial Economics)

आर्थिक सिद्धान्त की सामान्य बाते अन्य उद्योगों की ही भाँति कृषि क्षेत्र में भी लागू होती हैं । माँग और पूर्ति के साम्य किमत और वितरण सम्बधी विश्लेषण कृषि के बारे में उतने ही सत्य है जितने कि उद्योग के बारे में । फिर भी कृषि सम्बन्धी क्रियाएँ कुछ विशेष परिस्थितियों में की जाती है और उसके सिद्धान्त कृषि व्यवसाय में प्रचलित परिस्थितियों एवं मान्यताओं पर आधारित होते हैं । यही कारण है कि कृषि अर्थशास्त्र और औद्योगिक अर्थशास्त्र में अन्तर पाया जाता है । जैसा कि प्रो. कोहेन ने कहा है – ” कृषि अर्थशास्त्र एवं औद्योगिक अर्थशास्त्र में पूर्ति एवं माँग पक्ष दोनों में अन्तर पाया जाता है । अतः सामान्य औद्योगिक फर्म का अर्थशास्त्र कृषि में पूर्णरूपेण लागू नहीं किया जा सकता ।“ कृषि अर्थशास्त्र एवं औद्योगिक अर्थशास्त्र में निम्नलिखित मूल अन्तर है ।

(क) उत्पादन के आधार पर कृषि तथा औद्योगिक अर्थशास्त्र में अन्तर– उत्पादन के आधार पर कृषि तथा औद्योगिक अर्थशास्त्र में निम्नलिखित मूलभूत अन्तर पाये जाते हैं ।

१ उत्पत्ति के नियम में अन्तर

कृषि में अन्य साधनों की अपेक्षा भूमि का अधिक प्रयोग होता है । अतः कृषि में उत्पत्ति ऱ्हास की प्रवृत्ति शीघ्र ही लागू होती है । कृषि कला में उन्नति का प्रभाव क्रमशः उत्पत्ति वृद्धि समता के बाद शीघ्र ही ऱ्हास में बदल जाता है, जब कि उद्योग में भूमि की अपेक्षाकृत पूँजी और श्रम का अधिक प्रयोग होता है । उत्पत्ति वृद्धि की प्रवृत्ति काफी समय तक दृष्टिगोचर होती है । कुछ समय तक उत्पत्ति समता की प्रवृत्ति और बाद में उत्पत्ति ऱ्हास का नियम लागू होता है ।

2 मूल्य में उतार-चढ़ाव का अन्तर

कृषि उत्पादन मौसमी होने के कारण उत्पादन एक साथ बाजार में आकर मूल्य को गिरा देता है। अत: उत्पादकों को कम मूल्य मिलता है, जबकि औद्योगिक उत्पादन नियमित रूप से पूरे वर्ष माँग को ध्यान में रखकर वस्तु की पूर्ति की जाती है। इस प्रकार कीमत में उतार-चढ़ाव कम होता है।

3 संयुक्त उत्पादन संम्बन्धी अन्तर

कृषि में प्राय: संयुक्त उत्पादन होता है जैसे — गेहूँ और भुसा। अतः इन वस्तुओं के उत्पादन की अलग-अलग सीमान्त लागत ज्ञात करना कठिन है, जबकि उद्योग में प्रत्येक कल-कारखानों में अलग-अलग वस्तुएँ तैयार की जाती है। अत: सीमान्त लागत निर्धारण में कठिनाई नहीं होती।

4 उत्पादन में अनिश्चितता

प्रकृति पर निर्भर होने के कारण कृषि उत्पादन अनिश्चित रहता है जबकि औद्योगिक उत्पादन प्रति इकाई के हिसाब से होता है। मनुष्य प्रधान तथा प्रकृति का प्रभाग औद्योगिक उत्पादन में नगण्य रहता है।

5 उत्पादन का प्रमाणीकरण

कृषि वस्तुओं का गुण व स्वभाव बहुत कुछ मिट्टी की किस्म व जलवायु पर निर्भर करता है। अतः गुणों के आधार पर वस्तुओं का मान स्थापित करने में कठिनाई होती है, जबकि मिल मालिक अपनी आवश्यकता के अनुसार विभिन्न प्रकार की वस्तुओं को तैयार करता है। गुण के आधार पर वह एक वस्तु के विभिन मान स्थापित कर सकता है।

6 उत्पादन नाशवान –

कृषि पदार्थ अपेक्षाकृत नाशवान होते हैं जबकि औद्योगिक पदार्थ टिकाऊ होते है।

7 एकाधिकार –

कृषि उत्पादक एकाधिकार का लाभ नहीं उठा सकते क्योकि लाखों कृषि प्रक्षेत्रो में एक ही वस्तु उगाई जाती है, जबकि उद्योगो में एकाधिकार का जन्म व कानूनी एकाधिकार (पेटेन्ट) उत्पादकों के एकाधिकार लाभ उठाने की इच्छा से होता है। उद्योग एकाधिकार प्राप्त कर लेगा यदि उसके उत्पादन की कोई प्रतियोगिता न हो।

8 उत्पादन में समय का अतर

फसल उत्पादन में समय लगता है क्योकि यह भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कियाओं पर आधारित होती है जबकि औद्योगिक उत्पादन शीघ्र तैयार होता है।

(ख) विनिमय के आधार पर कृषि एवं औद्योगिक अर्थशास्त्र में अन्तर

विनिमय के आधार पर कृषि अर्थशास्त्र एवं औद्योगिक अर्थशास्त्र का अन्तर निम्न शीर्षको से स्पष्ट है।

1 विपणन कुशलता में अन्तर

तुलनात्मक रूप से कृषक एक ही क्रतु में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बहुत-सी वस्तूएँ पैदा करता है जिससे विपणन व्यय बढ़ जाता है जबकि उद्योगों में उत्पादन अधिक मात्रा में होता है, मध्यस्थ कम रहा है तथा विपणन व्यय भी कम होता है।

2 माँग के स्वरूप में अन्तर –

कृषि पदार्थों की माँग अलचीली होती है। अर्थात् रहन-सहन का स्तर ऊँचा होने पर कृषि पदार्थों की माँग कम बढ़ती है, जबकि औद्योगिक पदार्थों की माँग अपेक्षाकृत अधिक लचीली होती है।

3 पूँजी का प्रबन्ध

किसानों का आर्थिक स्तर नीचा होने के कारण व्यवसायी बँक रुपया उधार देने में हिचकिचाते हैं। अत: कृषक को पूँजी जुटाने में कठिनाई होती है जबकि उद्योगों में धन की व्यवस्था अपेक्षाकृत अच्छी रहती है क्योंकि उद्योगपति को बैंक में रुपया आसानी से मिल जाता है।

(ग) वितरण के आधार पर कृषि एवं औद्योगिक अर्थशास्त्र में अन्तर –

वितरण के आधार पर कृषि अर्थशास्त्र तथा औद्योगिक अर्थशास्त्र में निम्नलिखित अन्तर पाये जाते है:

1 कल्याण सीमा

किसानों द्वारा उत्पादित वस्तएँ अति आवश्यक होती है। अत्: वितरण द्वारा पूरे समाज का कल्याण होता है जबकि उद्योगपति उत्पादन व्यक्तिगत लाभ को ध्यान में रखकर करता है। हानि होने पर उत्पादन बन्द कर देता है।

2 विशिष्टीकरण व श्रम विभाजन

कृषि कार्य में विशिष्टीकरण व श्रम विभाजन कम होता है l फलत: कृषि मजदुरी भी कम होती है जबकि उद्योग में विशिष्टीकरण और श्रम विभाजन अधिक होता है । अत: मजदूरी भी अधिक होती है।

(घ) उपभोग के आधार पर कृषि एवं औद्योगिक अर्थशास्त्र में अन्तर

उपभोग के आधार पर कृषि तथा औद्योगिक अर्थशास्त्र में निम्न अन्तर विद्यमान है।

रहन-सहन का स्तर –

कृषि में कम आय होने के कारण रहन-सहन का स्तर नीचा होता है | जबकि अधिक आय के कारण उद्योग-धन्थों में लगे लोगों का जीवन स्तर उच्च होता है। उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट होता है कि सामान्य अर्थशास्त्र के नियम व सिद्धान्त कृषि अर्थशास्त्र के क्षेत्र में यथावत लागू नहीं होते, बल्कि कृषि की विशेषताओं के अनुसार उनमें परिवर्तन आवश्यक होते हैं।

 

 

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  1. Anonymous says

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