गुलदाउदी की व्यवसायिक उन्नत खेती – भाग – २

0

डिसबडिंग एवं निष्कालिकायन :-

यह क्रिया स्टेण्डर्ड टाइप गुलदाउदी में बड़े फूल प्राप्त करने के लिए की जाती हैं इसमें हर शाखा पर से अतिरिक्त कलियों को काट देना चाहिए तथा केवल एक या दो कलियाँ छोड़नी चाहिए। आमतौर पर हर शाखा से एक कली निकल दी जाती हैं। सिंगल कोरियन और स्प्रे वर्ग की किस्मों में डिसबडिंग करने की आवश्यकता नहीं होती हैं।

डिससूटिंग :-

यह क्रिया पौधों में शाकीय शाखा रखने के लिए की जाती हैं। शीर्षनोचन के बाद जब बगल में शाखाए निकलती हैं, तो उसमे से आवश्यकतानुसार स्वस्थ शाखाओं वाला पौधा तैयार करने के लिए एक शाखा बिच में तथा दो उसके अगल बगल में रखते हैं तथा अनावश्यक शाखाए हटा देते हैं। यह क्रिया स्प्रे टाइप किस्मों में नहीं करते हैं।

स्केटिंग (सहारा) :-

गुलदाउदी के पौधों की सीधी और अच्छी वृद्धि के लिए शेयर की आवश्यकता पड़ती हैं, जिसे बॉस की खपच्ची लगाकर किया जाता हैं यह विधि गमलों में पौधे उगाने के लिए तो ठीक हैं लेकिन व्यापारिक स्तर की खेती में लागत को देखते हुए दूसरी सस्ती विधि का उपयोग करते हैं। क्यारियों के दोनों छोर पर लगभग 75 सेमी. ऊँचा बॉस गाड़ देते हैं।

अब महीन तार को एक छोर से बांध देते हैं, जिससे की पौधे पंक्तिबद्ध रूप से उगे तथा उनकी शाखाये भूमितल में न गिरे। ये सम्पूर्ण प्रक्रिया अक्टुम्बर तक होनी चाहिये। गुलदाउदी की लम्बी प्रजाति को उगाते समय पहला तार 0 3सेमी. की ऊंचाई पर तथा तार 50 सेमी. की ऊंचाई पर लम्बाई में बांधना आवश्यक हैं। इससे पौधे सुचारु रूप से बढ़ते हैं तथा पार्श्व शाखाओं को भलीभांति बढ़ने का मौका मिलता हैं।

वृद्धि नियामक रसायन प्रयोग :-

वृद्धि नियामकों का प्रयोग गुलदाउदी के पौधे पर फूलों की संख्या तथा आकार बढ़ाने के लिए किया जाता हैं। जिब्रेलिक एसिड का 50 पी.पी.एम. घोल को दो बार क्रमशः 30 एवं 60 दिन बाद प्रयोग करके पौधों की वृद्धि को बढ़या जा सकता हैं।

ऐसा करने से फूलों की संख्या भी बढ़ जाती हैं। इसी प्रकार बी-नाइन का 0.25% का छिड़काव यदि पिंचिंग के बाद तीन सप्ताह के अंतराल पर दो बार किया जाये तो पौधे की ऊंचाई कम हो जाती हैं। बी-नाइन पौधे को बोना करने के साथ-साथ पत्तियों के रंग को भी अच्छा बनता हैं।

फूलों को काटने की अवस्था एवं रखरखाव :-

  • बड़े फूल वाली (स्टेण्डर्ड) किस्मों के फूल तभी काटने चाहिए जब वे पूरी तरह से खिल जाए और उनकी बहरी पंखुडिया पूरी तरह से सीधी हो जाए।
  • छोटे फूल वाली (स्प्रे) किस्मों को उस समय कटा जाना चाहिए, जब टहनी पर खिले सबसे पहले फूल पूरी तरह से खुल जाए।

 

गुलदाउदी के प्रमुख रोग एवं उनका प्रबंधन :-

पाउडरी मिल्ड्यू :-

फफूंद द्वारा जनित इस रोग में सफेद रंग के पाउडर की परत पत्तियों के ऊपरी भाग पर फेल जाती हैं तथा अत्यधिक संक्रमण की अवस्था में यह पत्तियों के पृष्ठ भाग व तने पर भी फेल जाती हैं। इसका प्रकोप अत्यधिक आर्द्रता वाले वातावरण में ज्यादा होता हैं। इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां धीरे-धीरे मुरझा जाती हैं तथा पौधा सूखने लगता हैं। इसकी रोकथाम के लिए डायनोकेप का 0.03% सांद्रता का घोल बनाकर समय-समय पर छिड़काव करना चाहिए। इस छिड़काव से इस रोग पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया हैं।

 

सेप्टोरिया ऑफ़ स्पॉट :-

वर्षात में गुलदाउदी की यह एक मुख्य बीमारी हैं। इसके संक्रमण से पुराणी पत्तियों पर पहले भूरे रंग का एवं बाद में काले रंग की घोल आकृति का धब्बा बन जाता हैं। तनों के निचले हिस्से की पत्तियां पहले प्रभावित होती हैं।

बीमारी का प्रकोप अत्यधिक होने पर पत्तियां जड़ जाती हैं तथा पौधा मर जाता हैं।  इस रोग पर नियंत्रण के लिए सर्वप्रथम रोग युक्त पौधों को नष्ट कर देते हैं मेंकोजेब या केप्टान या कार्बेन्डाजिम का 0.3% सांद्रता का घोल बनाकर छिड़काव (10 दिनों के अंतराल पर) करते हैं तथा क्यारियों में पानी के जमाव को रोकते हैं।

जड़ एवं तना सड़न :-

जड़ एवं तना सड़न जैसी बीमारी गर्म व आद्र वातावरण में ज्यादा फैलती है। यह बीमारी वानस्पतिक विधि से पौध सामग्री, को तैयार करते समय नर्सरी में पानी जमाव होने के कारण होता है। इस कवक के संक्रमण से पौधों की जड़े, तने व पत्तियाँ एकाएक गल जाती है। इसकी रोकथाम के लिए सर्वप्रथम रूटिंग मिडिया को ठीक ढंग से 1% फार्मेल्डिहाइड के घोल से उपचारित करंते हैं तथा यदि कोई कटिंग रोग से ग्रस्त है तो उसे निकालकर जमीं में खड्डा खोदकर दबा देते है। इसके आलावा अन्य कवकनाशी जैसे केप्टॉन या बिनोमिल के 2.0 सांद्रता वाले घोल से पौधों की ड्रेचिंग करते है।

बैक्टीरिया ब्लाइट :-

यह बैक्टीरिया द्धारा जनित रोग है। इससे संक्रमित पौधों का ऊपरी भाग मुर्जा कर गिर जाता है तथा नर्सरी में गुलदाउदी की पौध तैयार करते समय कटिंग्स का निचला हिस्सा भूरे-काले रंग का होकर गाल जाता है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए कटिंग्स को लगाने के पूर्व मिट्टी का शोधन करना चाहिए तथा कटिंग्स को जीव प्रतिरोधी  जैसे स्ट्रेप्टोमाइसिन या स्ट्रेपोसाइक्लीन के घोल में 4 घंटे तक डुबाकर रखना चहिये। इससे इस रोग पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जाता है।

विषाणु रोग :-

गुलदाउदी के पौधे कई  प्रकार के विषाणुओं से भी ग्रसित हो सकते है। विष्णु से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर विभिन्न प्रकार की आकृतियां एवं धब्बे दिखाई देते है। विष्णु रोग का फैलाव एफिड, थ्रिप्स, संक्रमित मातृ पौध से प्रवर्धन, संक्रमित औजार इत्यादि से होता है। इसकी रोकथाम के लिए एफडीस, थ्रिप्स पर नियंत्रण विषाणु मुक्त पौधों का प्रवर्धन तथा आस-पास उगने वाली घासों की सफाई एवं स्वच्छ कृषि यंत्रो का प्रयोग अनिवार्य है।

 

 

सदर सत्रासाठी आपण ही आपल्या कडील माहिती / लेख इतर शेतकऱ्यांच्या सोयीसाठी [email protected] या ई-मेल आयडी वर किंवा 8888122799 या नंबरवर पाठवू शकतात. आपण सादर केलेला लेख / माहिती आपले नाव व पत्त्यासह प्रकाशित केली जाईल

Leave A Reply

Your email address will not be published.