पेठा कद्दू की उन्नत खेती

0

अगर मिठाइयों के शौकीन हैं, तो आप ने जरूर आगरे के पेठे का नाम सुन रखा होगा और अगर आप को आगरा जाने का मौका मिला है, तो इसे चखने का मौका भी मिला होगा. आगरे का पेठा न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर में मशहूर है. इसलिए इस की मांग भारत के दूसरे प्रदेशों के अलावा दुनिया के तमाम देशों में बनी हुई है. यह मिठाई कई स्वादों और खुशबुओं में मिलती है. अंगूरी पेठा, नारियल पेठा, सूखा पेठा व काजू पेठा वगैरह इस की कुछ खास किस्में हैं.पेठा कद्दू वर्गीय प्रजाति के फल से बनाया जाता है, इसलिए इस फल का नाम पेठा कद्दू कहलाता है. यह हलके रंग का होता है और लंबे व गोल आकार में पाया जाता है. इस का इस्तेमाल ज्यादातर पेठा बनाने में किया जाता है. इस फल के ऊपर हलके सफेद रंग की पाउडर जैसी परत चढ़ी होती है.

कद्दू के लिए जलवायु और भूमि :

  1. कद्दू की खेती के लिए 18 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान और शीतोष्ण और समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है| अधिक या कम तापमान में इसकी पैदावार प्रभावित होती है| लेकिन इसको दोनों अवस्था में उगाया जा सकता है|
  2. इसको फसल के लिए अच्छी जीवांशयुक्त सभी प्रकार की मिट्टी में सफलतापुर्वक उगाया जा सकता है| लेकिन इसके लिए बलुई दोमट और दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त रहती है| जिसका पीएच मान 5.5 से 6.8 के मध्य होना चाहिए|

खेत की तैयारी और खाद उर्वरक :

  1. इस फसल के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए| इसके बाद 3 से 4 जुताई कल्टीवेटर या देशी हल से करनी चाहिए| ताकि मिट्टी भुरभुरी और हवा युक्त हो जाए, इसके बाद पाटा लगाकर खेत को समतल बना लेना चाहिए|

बुवाई :

पेठा बुवाई करने का ये है तरीका अगर किसान अगैती पेठा की खेती करना चाहता है तो खेत खाली होते ही गहरी जुताई करा दे। गहरी जुताई के बाद किसान 15 मई तक खेत की पलेवा कर दें। पानी लगाने के बाद खेत 20 मई तक पेठा की बुवाई कर सकते हैं। बुवाई के एक सप्ताह बाद पहला पानी और पहला पानी लगाने के 15 दिन बाद दूसरा पानी लगाते हैं। इसके बाद अगर बारिश हो गयी तो फिर पानी लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पेठा की बुवाई के लिए पन्द्रह हाथ का एक सीधा लकड़ी का डंडा ले लेते हैं, इस डंडे में दो-दो हाथ की दूरी पर फीता बांधकर निशान बना लेते हैं जिससे लाइन टेढ़ी न बने। दो हाथ की दूरी पर लम्बाई और चौड़ाई के अंतर पर गोबर की खाद का घुरवा बनाते हैं जिसमे कुम्हड़े के सात से आठ बीजे गाढ़ देते हैं अगर सभी जम गए तो बाद में तीन चार पौधे छोड़कर सब उखाड़ कर फेंक दिए जाते हैं। किसान इस बात का ध्यान रखें की लाइन सीधी रहे।

रोग और कीट रोकथाम :

  1. इस फसल में फफुद जनित रोग लगते है, इसकी रोकथाम के लिए 2 ग्राम बाविस्टिन या कैप्टान प्रति लिटर पानी में घोल बनाकर 10 से 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करते रहना चाहिए|
  2. कद्दू (Pumpkin) की फसल में कई तरह के रोग लगते है, इनकी रोकथाम के लिए एंडोसल्फान 25 ईसी 1.5 लिटर या मैलाथियान 2 लिटर को 700 से 800 लिटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर 10 से 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करते रहना चाहिए|

फल तुड़ाई और पैदावार :

  1. यदि आप ने सब्जी के लिए खेती की है, तो कद्दू (Pumpkin) को ज्यादा पकने ना दे और महीने में दो तुड़ाई कर के बाजार ले जाए|
  2. उपरोक्त विधी के अनुसार खेती करने के बाद कद्दू की पैदावार 275 से 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार होनी चाहिए|

तो उपरोक्त लेख से किसान भाई समज गये होंगे की कद्दू की आधुनिक तकनीकी से खेती कैसे की जाती है, और उसका अच्छा उत्पादन कैसे प्राप्त किया जा सकता है|

 

सदर सत्रासाठी आपण ही आपल्या कडील माहिती / लेख इतर शेतकऱ्यांच्या सोयीसाठी [email protected] या ई-मेल आयडी वर किंवा 8888122799 या नंबरवर पाठवू शकतात. आपण सादर केलेला लेख / माहिती आपले नाव व पत्त्यासह प्रकाशित केली जाईल.

Leave A Reply

Your email address will not be published.